सोमवार, 4 मार्च 2013

अभिषेक की सक्रियता...


मुख्यमंत्री रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह ने भाजयुओं के तीन दिवसीय सम्मेलन में जिस तरह से तीनों दिन सक्रियता दिखाई उसके बाद तो उनके राजनीति की चर्चा शुरू हो जाना स्वाीााविक है । वैसे अभिषेक सिंह की सक्रियता तो राजनांदगांव में पहले से ही है और उनके द्वारा मोर्चा संभालने की भी चर्चा है लेकिन भाजयुओं के सम्मेलन में उनकी सक्रियता का अलग ही मतलब निकाला जा रहा है और कहा जा रहा है कि क्योंकि इस सम्मेलन के आखरी दिन मुख्यमंत्री का पूरा परिवार पत्नी वीणा सिंह, पुत्रवधु एश्वर्या सिंह, पुत्र अभिषेक सिंह भी मौजूद थे । आम तौर पर इतने बड़े राजनैतिक सम्मेलनों पर बहुत कम नेताओं के पूरा परिवार मौजूद होता है ।
बत्ती वाले लाल से पीले हो रहे ...
कहने को तो मुख्यमंत्री रमन सिंह के अपने विधानसभा क्षेत्र के बड़े नेताओं को खुश करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है यहां से लीलाराम भोजवानी, अशोक शर्मा और खूबचंद पारख को लालबत्ती दी है लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है असंतोष बढ़ता ही जा रहा है । कहा जाता है कि मुख्यमंत्री के द्वारा राजनांदगांव से ही चुनाव लडऩे की घोषणा का सबसे ज्यादा असर इन तीनों लालबत्ती धारियों पर हुआ है । लालबत्ती के सहारे विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे इन तीनों नेतओं की मौहें तन गई है भले ही पार्टी अनुशासन के चलते कोई कुछ बोल नहीं रहा है लेकिन कहा जा रहा है कि अपनी लालबत्ती के साथ वे दूसरी लालबत्ती को भी बुझाने की तैयारी में है ।
किरण की दिक्कत...
राजधानी के महापौर किरणमयी नायक की दिक्कतें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है । महापौर के साथ यह दिक्कत तो उनके जीत के साथ ही तब शुरू हो गई थी जब उन्होंने सभापति चुनाव में गैट छत्तीसगढिय़ा का नारा बुलंद करने वाली किरणमयी नायक के पद पाते ही बदले आप से कई छत्तीसगढिय़ा नाराज है और उनके द्वारा अपनी अनुपस्थिति में प्रभारी महापौर बनाने को लेकर भी छत्तीसगढिय़ों में आक्रोश है । जबकि गैर छत्तीसगढिय़ा नेता उन्हें फूंटी आंख नहीं भाते । और कांग्रेस के भीतर भी उनके खिलाफ आक्रोश भी जबरदस्त है । अभी वे सभापति के अविश्वास प्रस्ताव के मामले से उबर भी नहीं पाई है कि सरकारी बंगले में डेयरी संचालन का मामला सामने आ गया । कहा जाताह है कि इस बार गैर छत्तीसढिय़ों ने उन्हें घेरने पूरी तैयारी कर ली है और उन्हें बर्खास्त करने की मांग तक कर रहे हैं । ऐसे में उनकी स्थिति इधर कुआं उधर खाई की हो गई है कहा जाय तो गलत नहीं होगा ?

मूणत का प्रबंधन और गुस्सा ...
तीन दिवसीय भाजयुओं सम्मेलन के प्रबंधन में राजेश मूणत के कोई कमी नहीं की । लाखों रूपये खर्च कर तमाम तरह की सुविधाएं जुटाई गई और किसी चीज की कमी नहीं होने की गई । यहां तक कि कार्यकर्ताओं से उनका व्यवहार भी देखने लायक था लेकिन आदत से लाचार मूणत का सब्र आखरी दिन टूट गया और राजनाथ के स्वागत के लिए कार्यकर्ताओं में मची होड़ से वे अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाये । मंच से ही वे कार्यकर्ताओं को फटकार लगाने लगे । यानी अनुशासन वाली पार्टी में भी अनुशासन तार-तार होता है । तभी तो एक कार्यकर्ता को कहना पड़ा सुन लो भाई खर्चा तो इन्ही ने किया है ।

सुषमा की नसीहत ...
भाजयुओं के सम्मेलन में पहुंची लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भाजपाईयों को जमीन से जुड़कर काम करने की नसीहत दे डाली जबकि यहां के भाजपाई तो इस नसीहत पर पहले से ही चल रहे है । जमीन के कारोबार ही नहीं बल्कि सरकारी जमीन हड़पने का खेल भी खूब चल रहा है । ऐसे में सुषमा स्वराज की नसीहत को लेकर चर्चा यह है कि कहीं जमीन से जुडऩे वालें की वजह से पार्टी को शिकस्त न मिल जाए ।
बाम्बरा का खेल ...
अपनी चालबाज छवि के लिए चर्चित पुलिस अधिकारी जी एस बाम्बरा अपने रिटायर्टमेंट के बाद भी यदि विभाग की नौकरी पर बने हुए है तो यह उनकी अपनी योग्यता ही है । गोटीबाजी में माहिर बाम्बरा की चाल में उनके कट्टर विरोधी भी फंस जाते हैं तभी तो पिछले दिनों पत्रकारों की पिटाई के मामले में उन्होंने एक पुलिस अधिकारी को बदनाम करने से भी नहीं चूकें और जब देखा कि पुलिस अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ रहा है तो पत्रकारों को झूटी खबर देकर अपनी चालबाजी से बाज नहीं आये ।

सोनी की सीनाजोरी,,,


वैसे तो राविप्रा अध्यक्ष सुनील सोनी अपने को विवादों से दूर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तोल मोल के बोल की तर्ज पर राजनीति करने वाले सूनील सोनी के हर बोल के पीछे राजनीति छुपी होती है। श्यामाचरण शुक्ल पर हमला का मामला हो या रविभवन का मामला हो, कमल विहार से लेकर फ्ऱी होल्ड तक उनके एक एक शब्द के पीछे की राजनीति बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं।
इस बार फ्ऱी होल्ड के मामले में निगम की एनओसी को खारिज कर दिया गया कि टैक्स वसूली का काम निगम का है। कहा जाता है कि महापौर के पत्र को खारिज करने के पीछे किरण बिल्डिंग का मामला हो सकता है।

ननकी की नसीहत

अपनी बेबाक बयानी के लिए चर्चित प्रदेश के गृहमंत्री ननकी राम कंवर जब भी मुंह खोलते हैं विवादों में पड़ जाते हैं। ताजा मामला महिलाओं को उनकी नसीहत का है। ननकी राम कंवर अवैध शराब बिक्री से परेशान हैं और वे इसके खिलाफ़ अपनी पीड़ा विधानसभा में भी यह कहकर व्यक्त कर चुके हैं कि शराब ठेकेदारों के इशारे पर थाने चल रहे हैं।
वैसे पुलिस पर भरोसा नहीं होने की वजह से उन्हे अपना स्क्वाड तक बनाना पड़ा था और अब वे महिलाओं को अवैध शराब के खिलाफ़ न केवल कमर कसने की नसीहत दे रहे हैं बल्कि लाठी उठाने लिए तैयार रहने को कह रहे हैं। अब उनकी सलाह पर महिलाओं ने लाठी उठाई तो क्या होगा?
नादान नंदू
यह बात तो प्रदेश का अदना सा कांग्रेसी भी जानता है कि नंद कुमार पटेल कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जरुर बन गए हैं लेकिन उनसे ज्यादा जोगी, वोरा, महंत ही नहीं कई और नेताओं की दिल्ली में चलती है। तभी तो उनकी नाराजगी का कार्यकर्ताओं पर कोई असर नहीं दिखता उल्टे दिल्ली से आने वाले मंत्री उनके किए कराए पानी फ़ेर देते हैं। ऐसे में नंदकुमार पटेल को गुस्सा आना स्वाभाविक है। यही वजह है कि वे इस बार नए सिरे से अपने विरोधियों पर दबाव बनाने की नादानी कर रहे हैं।
शाबास पिल्ले
भाजपा शासन काल में अग्रवाल अफसर के घर छापा,मारना किसी अचरज से कम नहीं है। लेकिन 
88 बैच के साफ और सौम्य छबि के आईपीएस संजय पिल्ले को जब ईओडब्लू और एसीबी की कमान सौंपी गई थी, तो लोगों को लगा था अब छापे और ट्रेप में कमी आ जाएगी। मगर पिल्ले, तो पूर्ववर्ती ईओडब्लू चीफ दुर्गेश माधव अवस्थी से भी एक कदम आगे निकल गए। महीने भर के भीतर ही बड़ा निशाना बनाया। 10 करोड़ी अफसर को पकड़ा, डिप्टी कमिश्नर कामर्सियल टैक्स शंकरलाल अग्रवाल को। अब उनके निशाने पर कौन है यह चुनावी साल में वे भी इशारे पर काम करेगें ।
दिग्गज की नजर
वैसे तो कांग्रेस में दावेदारी नई बात नहीं है लेकिन जैजैपुर के विधायक महंत रामसुंदर दास की  सीट पर कांग्रेस के एक दिग्गज नेता की नजर गड़ गई है। नेताजी अपनी अद्र्धांगिनी को इस सीट से चुनाव लड़ाना चाहते हैं। जैजैपुर सामान्य सीट है और इस समय कांग्रेस के लिए सबसे मुफीद समझी जा रही है। सो, नेताजी को और क्या चाहिए। महंतजी को, उनके लोगों के जरिये समझाने की कोशिश की जा रही है कि जैजैपुर की जगह चांपा या सक्ती में से जहां चाहे, उन्हें टिकिट दिलवा दी जाएगी। पर, महंतजी इसके खतरे से अनभिज्ञ नहीं हैं। फिर, वे जैजैपुर से दूसरी बार विधायक हैं। और तीसरी बार में भी कोई दिक्कत नहीं है। खुदा-न-खास्ते कांग्रेस कहीं आ गई, तो महंतजी मंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे। ऐसे में मना करने के अलावा उनके पास चारा क्या था। मगर नेताजी के लोग कहां मानने वाले। महंतजी के कार्यकर्ताओं को तोडऩे का काम चालू हो गया है। अब देखना है, महंतजी झुकते हैं या नेताजी। 
बोरा की खुशी
गर्भवती महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री द्वारा महतारी एक्सप्रेस चलाने की योजना का ऐलान करने पर सयसे अधिक कोई खुश है, तो वे हैं आईएएस सोनमणि बोरा। यह कांसेप्ट मूलत: बोरा का था और इसके लिए उन्हें यूनिसेफ से जमकर सराहना मिली थी। 2010 में बोरा जब बिलासपुर के कलेक्टर थे, तब उन्होंने महतारी एक्सप्रेस चलाई थी। इसके लिए टोल फ्री नम्बर 102 रखा गया था। सरकारी वेबसाइट पर नजर डालें, तो इस योजना का सर्वाधिक लाभ दूरस्थ और आदिवासी इलाके की महिलाओं को मिला था। तब बिलासपुर का संस्थागत प्रसव 17 से बढ़कर 54 फीसदी पहुंच गया था। अब राज्य सरकार ने इसे एडाप्ट कर लिया है। जाहिर है, इससे बोरा का नम्बर बढ़ा है। बोरा अभी हाउसिंग बोर्ड के कमिश्नर के साथ ही डीपीआर हैं।
फेरबदल का चक्कर
एसपी की सर्जरी अभी और आगे टल सकती थी। मगर बालोद में सीएम के रोड शो में काला झंडा की वजह से एसपी के लिस्ट पर विचार शुरू हो गया है। और खबर, तो यहां तक है, 14-15 को आदेश निकल सकते हैं या फिर 20-21 को लगभग तय मानिये। सिर्फ सीएम की अति व्यस्तता की वजह से इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो पा रहा है। जाहिर है, सूची में बालोद एसपी डीएल मनहर का नाम, एक नम्बर पर रहेगा। उसके बाद, रायपुर, रायगढ़, जांजगीर जैसे दर्जन भर से अधिक जिले होंगे। दावा ऐसा भी है कि रमन सरकार के नौ साल में एसपी लेवल पर यह सबसे बड़ा फेरबदल होगा। 27 में से आधे से अधिक जिले के एसपी बदल जाएंगे। इसकी वजह यह है कि मुख्यमंत्री एसपी के पारफारमेंस से खुश नहीं हैं। दूसरा, इस साल चुनाव भी है। रही राजधानी रायपुर की बात, तो किसी मैच्योर परसन को यहां की कमान सौंपी जाएगी। या तो रायगढ़ के एसपी आनंद छाबड़ा प्रोन्नत होकर एसएसपी बनेंगे या फिर बिलासपुर के रतनलाल डांगी को मौका दिया जाएगा। एसपी के रूप में डांगी का बिलासपुर चैथा जिला है। इसके अलावा रायपुर के लायक कोई आईपीएस सरकार को नहीं दिख रहा। तमिलनाडू कैडर से डेपुटेशन पर आई सोनल मिश्रा का नाम जरूर उछला था, मगर सरकार को नया चेहरा हजम नहीं हो रहा है। 

डॉ बांठिया के सरेण्डर का राज...



स्मार्ट कार्ड घोटाले में बुरी तरह फ़ंसे डॉ राजेन्द्र बांठिया को अंतत: पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पाई और डॉक्टर साहब ने आत्म समर्पण कर दिया। जेल में डॉक्टर साहब का क्या होगा वह तो बाद में पता चलेगा लेकिन जब सब कुछ सेट था तब उन्होने सरेण्डर क्यों किया इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। कहा जा रहा है कि उनकी गिरफ़्तारी को लेकर मीडिया का दबाव बढ़ता ही जा रहा था और पुलिस को डॉक्टर साहब की सम्पत्ति कुर्की करने का फऱमान जारी करना पड़ा। संपत्ति कुर्की के फऱमान का असर भी हुआ और कहा जाता है कि डॉक्टर साहब जिस आका के  दम पर फऱारी काट रहे थे उन्होने भी हाथ खड़े कर दिए।
भोंदू का जेल में भी जलवा
शहर की सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद के मुतवल्ली अब्दुल अजीम भोंदू को पुलिस ने गिरफ़्तार करके उसकी राजनीति का जुलूस जरुर निकाल दिया है लेकिन इस भाजपा नेता का प्रभाव कम नहीं हुआ है। तभी तो जेल से लेकर अस्पताल तक उसकी दबंगई के किस्से चौक चौराहों पर सुने जा सकते हैं। कहा जाता है कि जेल में भाजपाई होने का फ़ायदा तो मिल ही रहा है उसकी बात भी सबसे आसानी से हो जाती है। वैसे भी मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के खास बन चुके भोंदू की गिरफ़्तारी के पीछे कुछ न कुछ खेल है और इसका परिणाम आगे देखने को मिलेगा।
रमन का फ़्लाप शो...
अपनी साफ़ छवि के दम पर दूसरी पारी खेल रहे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का ब्रह्मास्त्र क्या है यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इन दिनों ने बने नौ जिलों में उनका रोड़ शो फ़्लाप साबित हो रहा है। कांग्रेस के विरोध के चलते प्रशासन की हालत खराब हो गई है और बढ़ती सुरक्षा के चलते आम आदमी की परेशानी भी कम नहीं है इसलिए रोड शो में सरकारी अमले और भाजपाई ही शामिल हो रहे है फिऱ बगैर सुविधाओं के जिलों से लोगों में नाराजगी भी कम नहीं है। अब तो भाजपाई भी कहने लगे हैं कि इस फ़्लाप शो का ईलाज कौन सा ब्रह्मास्त्र है।
मूणत की चुप्पी...
अपनी बदजुबानी के लिए विख्यात प्रदेश के उद्योग मंत्री राजेश मूणत को गुस्सा जल्दी आ जाता है और गुस्सा आता है तो वे उसे रोक भी नहीं पाते, ऐसे में जुबान से गालियां निकलना स्वाभाविक है। पिछले दिनों समता गृह निर्माण मंडल के कार्यक्रम में भी यही हुआ। लेकिन उन्होने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी इस गाली का असर इस तरह होगा कि उन्हे इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। कहा जा रहा है कि समता वाली घटना के दौरान बैस परिवार के एक सदस्य भी मौजूद थे और उन्होने मूणत के इस रवैये पर ऐसी बात कही कि मूणत को खामोशी ओढऩी पड़ी। आखिर इस साल के अंत में विधानसभा का चुनाव जो है।
मधुसूदन की मुस्कान ...
राजनांदगांव के सांसद मधुसूदन यादव इन दिनों मुस्कुराते नहीं थकते तो इसकी वजह मुख्यमंत्री रमन सिंह से सीधी पैठ को बताया जा रहा है। कहा जाता है कि मधुसूदन की इस मुस्कान ने अच्छे अच्छों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर अपने को बड़ा नेता मानने वालों की नींद ही गायब हो गई है। शिक्षा कर्मियों के मामले में मधुसूदन को हीरो बनाकर मुख्यमंत्री ने अपने विरोधियों को यह जता दिया है कि वे किसी को भी हीरो बना सकते हैं और यही वजह है कि मधुसूदन यादव की मुस्कान से कई नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है। कहा जाता है कि रमेश बैस, सरोज पांडे, नंदकुमार साय जैसे सांसदों पर अप्रत्यक्ष हमला कर मुख्यमंत्री ने अपना उद्देश्य भी बता दिया है।
राम निवास की दिक्कत...
यह तो सिर मुडाते ही ओले पडऩे वाली कहावत को चरितार्थ करता है वरना यादवी ब्रिगेड के हीरो रामनिवास को डी जी बनने के बाद हाईकोर्ट से यह सब सुनने नहीं मिलता। कोर्ट में  पहुंच कर व्यवस्था सुधारने का वादा कर चुके डी जी के सामने सबसे बड़ी दिक्कत तो पी एच क्यू में व्याप्त गुटबाजी है। इसके अलावा राजनैतिक दबाव से थाने में जमे थानेदारों की करतूत भी कम नहीं है। राजधानी में चार साल से जमे पुलिस कप्तान सहित कई अधिकारियों के कारनामों पर भी वे खुश नहीं हैं। ऐसे में उनकी कितनी चलती है यह सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुनील कुमार की पीड़ा...
अपनी ईमानदार छवि को लेकर मुख्य सचिव के पद तक सफऱ करने वाले सुनील कुमार इन दिनों अखबारों से भी दुखी हैं और उनकी पीड़ा गांधी जी की पूण्य तिथि के दिन होठों से निकल ही गई। मंत्रालय के निरीक्षण करते मुख्य सचिव महोदय छज्जा गिरने वाले लेखा शाखा में पहुंचे और अधिकारियों ने जब खास नुकसान नहीं होने की जानकारी दी तो वे बोल पड़े, नुकसान से ज्यादा अखबारों में प्रकाशित हो गया। अब मुख्य सचिव महोदय को कौन समझाए कि छज्जा गिरना भी बड़ी खबर है वह भी तब जब मंत्रायल को बने ज्यादा दिन नहीं हुए हैं।

प्रतिज्ञा में फ़ंसे ठाकुर


महाभारत में बार-बार चेताया गया है कि बिना सोचे समझे प्रतिज्ञा या संकल्प मत करो। इसी प्रतिज्ञा के चलते भीष्म पितामह न केवल कुंवारे रह गए बल्कि जिन्दगी भर रोते रहे और दूर्योधन जैसे दुष्ट का साथ देना पड़ा। ऐसी जिद वाली प्रतिज्ञा के चलते अर्जुन की आग में जलकर प्राण त्यागने की नौबत आ गई थी वह कृष्ण की चतुराई से जयद्रथ दिन ढलने से पहले मारा गया। ये बात हिन्दुत्व की दुहाई देने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह को समझ नहीं आई या वे महाभारत नहीं पढ पाए, ये तो वही जाने। लेकिन ऐसी ही प्रतिज्ञा याने संकल्प के चलते शिक्षाकर्मी और 270 रुपए बोनस नहीं पाने वाले किसान नाराज हो गए हैं। तो अब ठाकुर की ठकुराई का क्या होगा? भाजपा की चिंता स्वाभाविक है।
पटेल की परेशानी
जब से अजीत जोगी गुट को छोड़कर प्रदेश कांग्रेस का ताज अपने सिर लिया है नंदकुमार पटेल की मुसिबत थमने का नाम ही नहीं ले रही है। एक तरफ़ भाजपा से कांग्रेसियों की सेटिंग की खबर से हैरान है तो दूसरी तरफ़ नेता प्रतिपक्ष से पटरी बिठाने की जिम्मेदारी बढने लगी है। कहा जाता है कि अजीत जोगी, मोतीलाल वोरा और विद्याचरण शुक्ल को खुश रखने के की कवायद में कई बार वे दुखी हो जाते हैं। जबकि भाजपा के खिलाफ़ दमदार प्रदर्शन के बाद भी उन्हे महंत के सामने कमजोर समझा जाता है।
ऐसे में प्रदेशाध्यक्ष द्वारा चुनाव नहीं लडऩे के फऱमान ने उनकी चिंता बढा दी है। ऐसे में सीएम का सपना कहां जाएगा यह कम चिंतनीय नहीं है।
सिघानिया की चालाकी
रायपुर शहर से विधानसभा चुनाव हारने के बाद कसडोल के विधायक राजकमल सिंघानिया को यह बात समझ में आ गई थी कि चाहे जितना भी पैसा खर्च कर लो शहर में उनकी अपनी छवि के चलते जीत नहीं हो सकती। तभी तो चालाकी से न केवल कसडोल से टिकिट हासिल कर ली बल्कि दो बार विधायक भी बन गए। कहते हैं की दूध का जला छाछ को फ़ूंक-फ़ूंक कर पीता है। तभी तो वे कांग्रेस के कलेक्टर घेराव प्रदर्शन से दूर तब तक रहे जब तक किसान मोर्चा का प्रदर्शन खत्म नहीं हो गया। वे जानते थे कि किसान मोर्चा में प्रदर्शन करने वाले राजकमल सिंघानिया की छवि अच्छे से बनाएगें और रामगुलाम ठाकुर ने किया भी वही। बाद में दशरथ वर्मा के घर में बैठकर अपनी उपस्थिति की चालाकी कर गए।
सीएस की स्वीकारोक्ति
अपनी साफ़ सुथरी और ईमानदार छवि के लिए विख्यात प्रदेश के सीएस यानी मुख्य सचिव सुनील कुमार को आखिर हाईकोर्ट जाना ही पड़ गया। राज्य में रमन सरकार की करतूतों की वजह से अफ़सरशाही हावी है। भ्रष्टाचार में गले तक डुबे अफ़सरों को सरकार का सीधा सरंक्षण है, यही वजह है कि आम आदमी अफ़सरशाही से त्रस्त है ही न्यायालय भि अफ़सरों के रवैये से हैरान है। तभी तो न्यायालय को मुख्य सचिव को तलब करना पड़ा। पदोन्नति से लेकर तबादलों में मनमानी चरम पर है और सरकार के मंत्री इस पर ध्यान नही दे रहे हैं। इसलिए लोग न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर हैं। अब न्यायालय ने जब इसे संज्ञान में लिया तो मुख्य सचिव ने न केवल गलती स्वीकारी बल्कि दोबारा शिकायत का मौका नहीं देने का वादा भी किया है। देखना है आगे क्या होता है।
कंवर का कहर...
अपने बेबाक बोलों से से हमेशा ही सुर्खियों में बने रहने वाले प्रदेश के गृहमंत्री ननकी राम कंवर के कहर से न मुख्यमंत्री बच पाए हैं और नही पुलिस निदेशक बचे हैं। इस बार उनके निशाने पर अधिकारी रहे। बैंक शाखा में कोर बैंकिंग की शुरुवात करने पंडरिया पहुंचे कंवर ने बैंकों के द्वारा गैर किसानों को लोन देने के मामले में कहा कि किसान बेईमान नहीं होता और न ही जनता बेईमान होती है। बेईमान तो अधिकारी होता है।
कंवर साहब नेताओं की बेईमानी का क्या होगा ? आखिर राजकुमार नायड़ू जैसे आरोपी अफ़सर को संरक्षण किसने दिया था ?
मोहिले भी भयभीत
लोकसभा छोड़ विधानसभा में जीत हासिल करने के वाले सतनामी समाज के नेता और प्रदेश के खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले पिछली बार जितने निश्चिंत थे वैसे बेफ्ऱिकी अब नहीं दिखाई पड़ रही है। सतनामी समाज आरक्षण से कटौती के चलते भाजपा सरकार से नाराज है और जिस तरह से उन्हे समाज के लोगों से सुनना पड़ रहा है उससे वे बेहद परेशान बताए जा रहे हैं। भले ही रमन सरकार चुनावी बजट में सतनामी समाज को खुश कर दे, लेकिन फि़लहाल तो चिंता की रेखाएं पुन्नुलाल मोहिले के चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
रामविचार का दुर्भाग्य
प्रदेश सरकार के जलसंसाधन मंत्री रामविचार नेताम जब भी अपनी ताकत बढाने की सोचते हैं तब कुछ न कुछ गडग़ड़ हो जाती है। मुख्यमंत्री बनने की कोशिश पहले ही पकड़ ली गई तो पत्नी के जिला पंचायत में विवाद से उनकी छवि पर असर पड़ा। पंचायत विभाग छोड़ कर जलसंसाधन विभाग पहुंचे तो घपलेबाजी ने उनकी मिट्टी पलीद करना शुरु कर दिया। बेचारे नेताम जी नमाज माफ़ कराने गए तो रोजे गले पड़ गए की तर्ज पर मैनपाट कार्निवल के अश्लील नाच में फ़ंस गए। मैनपाट कार्निवल में विदेशी पर्यटकों को लुभाने की कोशिश इतनी भारी पड़ी कि अब वे सफ़ाई देते घुम रहे हैं कि यह उनका कार्यक्रम नहीं बल्कि बृजमोहन अग्रवाल के विभाग का कार्यक्रम था। अब अश्लील डांस तो हुआ है और तालियाँ भी बजाई गई है तो इस मजे की सजा भी जरुरी है।

राजेश का रौब


अपनी गंदी जुबान के लिए चर्चित प्रदेश के उद्योग मंत्री राजेश मूणत के लिए नतो गाली गलौज करना नई बात है और न ही बाहें चढाना भी नई बात है। यही वजह है कि इनकी करतूत पर विधानसभा तक में सरकार को शर्मिन्दा होना पड़ा।
लगता है कि इसके बाद भी न तो उन्हे मंत्री बनाने वाले को कोई फ़र्क पड़ा है और न ही राजेश मूणत के व्यवहार में ही बदलाव आया है। तभी तो पिछले दिनों समता गृह निर्माण सोसायटी के कार्यक्रम में  वे सोसायटी के मैनेजर शैलेष मिश्रा से सीधे गाली गलौज पर उतर आए। इनके मुखारविंद से निकलने वाले अपशब्द सुनकर वहाँ उपस्थित लोग नाराज हुए बिना नहीं रह सके। जबकि भाजपा के सांसद रमेश बैस के एक रिश्तेदार ने तो इस पर कड़ी आपत्ति करते हुए मुख्यमंत्री से मिलने तक की बात कही है। अपनी कड़ूवी जुबान को लेकर मूणत कहाँ क्या बका है इसे लेकर अब उन्हे बुलाने वालों को भी सोचना पड़ेगा।
चरण की चालाकी
केन्द्र सरकार में छत्तीसगढ के इकलौते मंत्री चरणदास महंत की चतुराई की चर्चा इन दिनों जोरों पर है।  चित्त भी मेरा, पट भी मेरा, अंटी मेरे ज्ज् की तर्ज पर वे जहां मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं तो दूसरी तरफ़ राज्य सरकार से भी वे पंगा लेने के पक्ष में नहीं है। तभी तो जब छत्तीसगढ के कांग्रेसी आन्दोलित है और रमन सरकार के नाक में दम कर रखा है। सरकार की करतूतों की वजह से दूरी बनाई जा रही है तब डॉ चरण दास महंत का सीएम हाऊस में जाकर रमन सिंह से मिलना चर्चा में है।
रामविचार का "कुत्ता"
यह सत का दंभ नहीं तो और क्या है? राजनीति में विरोधियों के खिलाफ़ राजनैतिक सूचिता की दुहाई देने वाली पार्टी के मंत्री ही जब विरोधियों पर अपशब्द कहें तो समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ में राजनीति कहाँ की जा रही है।
कहा जाता है कि आदिवासी मुहिम चलाकर कभी मुख्यमंत्री का सपना संजोने वाले प्रदेश सरकार के मंत्री रामविचार नेताम इन दिनों खुद की जमीन खिसकते देख बौखला गए हैं तभी तो वे आदिवासी आश्रम में हुए बच्चियों के दुष्कर्म पर न्याय मांगने वाले को कुत्ते तक कह दिया। बालोद में दिए इस बयाने को लेकर भाजपा खुद पेशोपश में है।
बैस की नकेल
रायपुर के सांसद रमेश बैस जी जब ज्यादा बोलने लगते हैं  तो नागपुर से लेकर दिल्ली तक गुंज सुनाई देती है। लगता है इसलिए आलाकमान उनकी नकेल अपने हाथ में रखता है। अब बैस जी भी क्या करें। मुख्यमंत्री बनने का सपना तो अभी सपना ही है और मुंह से कुछ बोलो तो अनर्थ हो जाता है।
अब कोयला कांड में जब वे गुस्सा हुए तो बयान वापस लेना पड़ा। कमल विहार मामले में भी उन्हे अब किसी का दुख नहीं दिखता और आदिवासी आश्रम में बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म पर भी वे बोले तो विवाद में फ़ंस गए। ऐसे में नकेल नहीं कसा जाएगा तो क्या होगा?

रमन अपने में मगन


अपनी साफ छवि के दम पर सत्ता की दूसरी पारी खेल रहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को इस बार भी हैट्रिक का भरोसा है तो इसकी वजह विपक्ष का बिखराव व कमजोर हमला है । तभी तो कोयले की कालिख पर जुबान खोलने वाले पार्टी के नेता चुप है । रोगदाबांध पर भी कोई नहीं बोलता, बाबूलाल अग्रवाल भी महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं । भ्रष्टाचार से लेकर बलात्कार के मामले शर्मनाक स्थिति में पहुंचने के बाद भी सरकार के माथे पर सिकन नहीं है । शासकीय कर्मियों व शिक्षा कर्मियों का आन्दोलन चरम पर है । चुनावी साल में मंत्री-विधायक अपनी जीत के लिए लग गए हैं यानी उनकी तरफ से भी कोई परेशानी नहीं । मंत्रालय भी शहर से दूर कर दिया गया है यानी आम आदमी भी आसानी से नहीं पहुंच पा रहे हैं । और पार्टी कार्यकर्ताओं को समझा दिया गया है कि पार्टी सत्ता में रहेगी तभी उन्हें मलाई खाने मिलेगा ।
अमर का विदेश प्रेम...
प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का विदेश प्रेम इन दिनों चर्चा में है । कहा जाता है कि जब भी वे विदेश यात्रा का प्लान बनाते है कोई न कोई ऐसा मामला आ जाता है जिससे उनका विदेश प्रवास विवादों में पड़ जाता है ।
इस बार भी आंख फोड़वा कांड की वजह से उनकी विदेश प्रवास विवादों में पड़ गया । सरकार को जवाब देते नहीं बन रहा था ।
अब तो लोग कहने लगे है कि जब से स्वास्थ्य विभाग संभाले हैं कुछ न कुछ हो ही रहा है । गर्भाशय कांड से लेकर आंखफोड़वा कांड का जवाब देना वैसे भी मुश्किल है ऐसे में विदेश प्रेम कहीं भारी न पड़ जाए ।
लता की परेशानी ...
नक्सलियों से संबंध के आरोप से परेशान प्रदेश सरकार की एक मात्र युवा महिला मंत्री लता उसेंडी की दिक्कत थमने का नाम ही नहीं ले रहा है । इधर नक्सलियों से संबंध का आरोप तो खेल विभाग में शराब ठेकेदार के बढ़ते हस्तक्षेप ने उनकी मुसिबत और बढ़ा दी है । आजकल हर आयोजन में शराब ठेकेदार की मंच पर उपस्थिति से वे हैरान ही नहीं परेशान भी है लेकिन शराब ठेकेदार की मुख्यमंत्री से सीधे संबंध होने के कारण वे कुछ बोल नहीं पा रही है । लेकिन इसके दुस्परिणाम ने उनकी चिंता जरूर बढ़ा  दी है ।
पटेल  की दुविधा...
गृह मंत्री जैसे पद पर रहने वाले प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उन्हें आज भी कोई नेता नहीं मानता, प्रदेश में जब भी नेताओं की गिनती होती है जोगी वीसी और वोरा के नाम की ही चर्चा होती है ऐसे में आन्दोलन का प्रभाव भी उतना नहीं पड़ रहा है और भाजपा से सेटिंग की चर्चा थमने का नाम ही नहीं ले रहा है । ये अलग बात है कि वे पूरी ताकत से भाजपा के खिलाफ रण्नीति बना रहे है लेकिन मामला फिर वहीं का वहीं रह जाता है यानी रात भर चले अढ़ाई कोस ।

ननकी का निशाना ...


कभी आदिवासी मुख्यमंत्री का अभियान चलाने वाले प्रदेश के गृह मंत्री ननकी राम कंवर भले ही परिस्थितिवश अपनी मुहिम से पीछे हट गए हो लेकिन समय समय पर उनका गुस्सा बाहर आ ही जाता है । कभी एसपी को निकक्मा और कलेक्टर को दलाल कह कर वे मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हैं तो कभी  शराब ठेकेदार से नजदीकी की वजह से थाने बिकने की बात कहकर प्रहार करते हैं । इस बार वे नये वर्ष के बहाने अपने गुस्से को बाहर निकालने से नहीं चुके । बकौल ननकी राम कंवर हम तो नया वर्ष चैत्र प्रतिपदा को मनाते है ।
ऐसे में इस बार उनके निशाने पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह थे या बृजमोहन अग्रवाल यह तो वही जाने क्योंकि दोनों ही मंत्री नया साल मनाने बाहर गये थे ऐसे में उन्होंने नया वर्ष की परिभाषा देकर सरकार के हिन्दुत्व पर सवाल तो उठाये ही हैं । आने वाले दिनों के लिए नया सवाल भी खड़ा किया है ।
रमन की परेशानी ...
कहते हैं काले रंग पर कोई और रंग नहीं चढता तभी तो प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कोयले की कालिख को पोछ नहीं पा रहे है और दूसरी मुसिबत शिक्षा कर्मी के रूप में शुरू हो गई है । दिक्कत यह है कि वे संविलियन के संकल्प से इसलिए भी अपने को अलग नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि संविलियन का संकल्प भी उनके ही अध्यक्षीय कार्यकाल में लिया गया था । इसलिए वे बेहद परेशान है तभी तो इन दिनों वे मंदिरों का चक्कर लगा रहे हैं । देखना है भगवान उनकी सुनते है या शिक्षा कर्मियों की ।
बिरजू की नई उलझन ....
कहा जाता है कि जैसे ही गुजरात के नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की चर्चा होती है प्रदेश के दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है । भले ही भाजपा के लोग नये नवेले राज्य में नेता प्रतिपक्ष के चुनाव में हुए हंगामें के दौरान पर्यवेक्षक बने नरेन्द्र मोदी के पलंग के नीचे छीपने की घटना को भूल गये हो लेकिन तब के बिरजू अग्रवाल इस घटना को नहीं  भूले हैं और परेशानी यह है कि कहीं नरेन्द्र मोदी भी इस घटना को नहीं भूले होंगे तब क्या होगा ।
बैस को बुखार...
कहते है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर नितिन गडकरी की फिर से ताजपोशी की खबर से अच्छे-अच्छे को बुखार चढऩे लगा है
 इनमें रायपुर के सांसद रमेश बैस का भी नाम लिया जा रहा है । कहते हैं कि कोल घोटाले में संचेती बुंधुओं की करतूत को लेकर रमेश बैस ने भी कुछ-कुछ बोल दिया था ऐसे में चुनावी टिकिट जब गडकरी के हाथ हो तो बुखार तो चढऩा ही है ।
मोहिले का बेटा
वैसे तो प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों के रिश्तेदारों की धौंस का नजारा अक्सर देखने को मिलता है । ऐसे में प्रदेश के खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले के पुत्र पद्मिनी मोहिले ने हंगामा किया तो कुछ अलग हट के नहीं किया । पिछले दिनों मंत्री पुत्र पद्मिनी ने अम्बेडकर अस्पताल में जमकर हंगामा किया हालांकि चर्चा यह भी है कि उन्हें हंगामा करने की कीमत भी चुकानी पड़ी और सुरक्षा गार्ड मंत्री पुत्र पर भारी पड़े लेकिन बाद मं सुपरवाइजर को निलंबित कर दिया गया अब इसे लेकर कोई यह कहे कि सत्ता का दंम चरम पर है तो क्या गलत है ।
डीजी की पसंद...
प्रदेश के नव नियुक्त डी जी रामनिवास यादव की कार्यशैली के कई चर्चे है 7 संत कुमार से जूनियर होने के बाद भी डी जी बने रामनिवास यादव को नई राजधानी रास नहीं आ रहा है तभी तो उनका ज्यादातार समय पुराने पुलिस मुख्यालय में ही गुजरता है कहने को तो हल्ला फस्र्टहॉमु में नई राजधानी में बैठने का है लेकिन सच क्या है यह सभी जान गये हैं । आखिर गुटबाजी भी तो यहां कम नहीं है ।
कर्मा का दुख...
कभी नेता प्रतिपक्ष जैसे पद पर रहे आदिवासी नेता महेन्द्र कर्मा इन दिनों अपनी घटती पूछ परख से परेशान है । विधानसभा चुनाव हारने के बाद बदले घटना क्रम ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है एक तरफ अजीत जोगी का बैर तो दूसरी तरफ भाजपा से कथित सेटिंग के आरोप से वे उबर ही नहीं पा रहे है ऐसे में ेेेविधानसभा की टिकिट की लेकर संशय दिखे तो दुख तो होगा ही ।
जिंदल पर मजबूर...
कोल घोटाले से लेकर जमीन हड़पने जैसे मामले में जिंदल ग्रुप की कथित संलिप्तता ने प्रदेश में कांग्रेस की दिक्कत बड़ादी है । हरियाण के इस कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल के उद्योग समूह के कारनामों को लेकर भले ही प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल कुछ नहीं बोल पा रहे हो लेकिन कांगे्रस के कई दिग्गज बेहद नाराज हैं वीसी शुक्ल ने तो उन्हें कांग्रेसी मानने से ही इंकार कर चुके ै जबकि भाजपा से जिंदल के गठजोड़ के किस्से कम नहीं है इसके बाद भी यदि कांग्रेस जिंदल को लेकर चुप है तो लोगों में क्या छवि बनेगी कहना मुश्किल नही है ।