शनिवार, 23 मार्च 2013

बिरजू की बांसुरी बेसुरी हुई।


अपने स्टाईल से विरोधियों में भी लोकप्रिय प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने सपने में भी नहीं सोचा था कि पांचवे कुंभ की कलई उनकी ही पार्टी के लोग खोल देंगे। वे तो राजिम कुंभ को लेकर इतने आश्वस्त थे कि उनके राजिम से चुनाव लडऩे तक की हवा उडऩे लगी थी। लेकिन प्रदेश सरकार ने विधायकों का इलाहाबाद कुंभ स्नान का दौरा बनाकर सब मटिया मेट कर दिया। इससे पांचवे कुंभ को स्थापित करने की राह में खलल तो हुआ ही धर्म और छत्तीसगढिय़ा संस्कृति से खिलवाड़ का तोहमत भी लगने लगा है अब बिरजू इसे पांचवा कुंभ कहे भी तो कैसे?
मोदी-शिव में फंसे रमन...
अब तक भाजपा के हर बड़े कार्यक्रम में वाहवाही लुटने वाले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को इस बार मुंह की खानी पड़ी। पूरे सम्मेलन के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छाये रहे। यहां तक कि राजनाथ से लेकर आडवानी तक उनके नाम का जिक्र नहीं किया। छत्तीसगढ़ के विकास मॉडल भी गुम हो गया तो इसकी वजह यहां बताने वाला विकास नहीं होना है। इसके अलावा रमन सिंह के जिक्र नहीं होने की वजह कोयले की कालिख भी बताया जा रहा है।
सचिदानंद का भरोसा...
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस विधायक कुलदीप जुनेजा के हाथों पराजय होने वाले शहर के इकलौते भाजपा प्रतयाशी सचिदानंद उपासने को आने वाले चुनाव में टिकिट मिलने का यदि पूरा भरोसा है तो इसकी वजह कम वोट से हारने के अलावा दिल्ली में बैठे भाई की पहुंच है। हालांकि उनके क्षेत्र से सुनील सोनी और श्रीचंद सुुंदरानी के अलावा कई और दावेदार हैं।
चंदेल पर भारी...
भले ही बढ़ते अपराध को लेकर ग्रह-नक्षत्र की बात करने वाले ननकीराम कंवर के विवादस्पद ब्यान पर पार्टी में ही एका न हो लेकिन लगता है विधानसभा उपाध्यक्ष नारायण चंदेल की गृह दशा ठीक नहीं चल रही है तभी तो वे इन दिनों ज्योतिष के फेर में पड़ गये हैं। पहले उनके काफिले ने राजधानी में एक कालेज छात्रा मजु जैन की जान ले ली और अब वे जब उडऩ खटोला से चांपा जांजगीर में उतर रहे थे तो ठीक पहले हेलीपेड के नजदीक आग लग गई। अब इस घटना के बाद उनके साथ् दौरे में जानेके लिए कई लोग घबराने लगे हैं।
कुर्सी का खेल
आईपीएल हो और उसमें खेल की कोशिश न हो, यह भला हो सकता है। आईपीएल का ऐलान होते ही नेताओं से जुड़े कई सप्लायरों के लार टपकने शुरू हो गए थे। खास कर कुर्सी सप्लाई के लिए। कुर्सी सप्लाई बोले तो माल चोखा। 50,000 कुर्सी में एक पर, गिरे हालत में 200 रुपए भी बचा, तो एक करोड़ अंदर। फिलहाल, आरटीआई एक्टिविस्ट यह जानने के लिए एक्टिव हो गए हैं कि 1200 रुपए में कुर्सी का टेंडर हुआ है, उसमें किस नेता की कितनी चली है और कितना अंदर होगा। वजह, नागपुर स्टेडियम में बीसीसीआई ने पिछले साल 450 रुपए में कुर्सी लगवाई है। नागपुर स्टेडियम बीसीसीआई का है और वह हल्की चीज तो खरीदेगा नहीं। फिर, साल में दो-एक मैच वहां होते ही हैं। और यहां 1200, तो आरटीआई वालों का माथा ठनकना स्वाभाविक है।  
बुरे फंसे
रेलवे एसपी केसी अग्रवाल के सामने, मिलकर भी ना मिलने वाली स्थिति निर्मित हो गई है। दरअसल, सरकार ने पिछले दिनों आईपीएस की मेजर सर्जरी की थी, उसमें उन्हें मुंगेली का एसपी बनाया गया था। मगर पोस्टिंग के समय चूक हो गई। मुंगेली उनका गृह जिला है, इस पर किसी का ध्यान नहीं गया। वे उसी जिले के पथरिया के रहने वाले हैं। सो, चुनाव आयोग उन्हें छोड़ेगा नहीं। अब, अग्रवाल ने सरकार से आग्रह किया है कि उन्हें दूसरा कोई जिला दे दिया जाए। और सरकार के सामने असमंजस यह है कि जिन 18 जिलों के एसपी बदले गए थे, उनमें से सभी ज्वाईन कर लिए हैं। अब, अग्रवाल को कहां एडजस्ट किया जाए, कठिन प्रश्न हो गया है। इस चक्कर में पखवाड़े भर से मुंगेली जिला भी खाली है। वहां के एसपी कोटवानी रिलीव होकर चले गए हैं। अब खबर आ रही है, मुंगेली में अब नया एसपी पोस्ट किया जाएगा और संभवत: अग्रवाल को रेलवे एसपी यथावत रखा जाए।
पुअर पारफारमेंस
चुनावी साल होने की वजह से बजट सत्र में अबकी कांगे्रस से अग्रेसिव पारफारमेंस की उम्मीद की जा रही थी। मगर दिख उल्टा रहा है। आठ दिन की कार्रवाइयों में एक भी दिन ऐसा नहीं हुआ, जब विपक्ष, सरकार को बगले झांकने पर मजबूर किया हो। कुछ गंभीर मुद्दे भी आए, तो आक्रमण करने वाला दस्ता सदन से नदारत था। राज्य बनने के 12 साल में गुरूवार को पहली बार लोगों ने देखा, गृह विभाग की अनुदान पर चर्चा ढाई घंटे में सिमट गई। सत्ता पक्ष की ओर सीएम और मंत्रियों को मिलाकर 24 सदस्य थे, वहीं विपक्ष के मात्र आठ। नेता प्रतिपक्ष से लेकर नंदकुमार पटेल, अजीत जोगी जैसे सभी गैर हाजिर। ऐसे में संसदीय कार्य मंत्री बृजमोहन अग्रवाल कटाक्ष करने का मौका मिल गया, गृह विभाग का काम इतना बढिय़ां चल रहा है कि पहले इस पर आठ-आठ घंटा चर्चा होती थी, इस बार ढाई घंटे में ही गृह मंत्री की बोलने की बारी आ गई। आश्चर्य तो तब हुआ, जब राज्यपाल के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष के भाषण के समय सदन में एक चैथाई से भी कम सदस्य बच गए थे। कांग्रेस के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है। 

सोमवार, 4 मार्च 2013

कोरबा रोड़ ही सही


बिलासपुर के एसपी रतनलाल डांगी देश के संभवत: पहले एसपी होंगे, जिन्हें शहर में रहना नहीं भाता। उन्होंने जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर कोनी ग्राम पंचायत के आमतौर पर सूनसान रहने वाले इलाके में अपना ठिकाना बनाया है। जाहिर है, एसपी का बंगला अपने-आप में कंट्रोल रुम से कम नहीं होता, और उस इलाके के दो-तीन किलोमीटर के सराउंडिंग के लोग अपने को सुरक्षित समझते हैं। अब, एसपी ही शहर से बाहर रहेगा, तो पोलिसिंग का अंदाजा आप लगा सकते हैं। लेकिन कप्तान को बोले कौन। आईजी अशोक जूनेजा ने उनको इशारा किया था। नए आईजी राजेश मिश्रा को पता चला तो वे भी आवाक रह गए। अब, ऐसे में लोगबाग चुटकी क्यों न लें। कह रहे हैं.....डांगी साब, लंबे समय तक कोरबा में एसपी रहे हैं और अब कोरबा नही ंतो कोरबा रोड ही सही। मगर इससे पोलिसिंग का तो बाजा बज रहा है। न्यायधानी, अपराधधानी में तब्दील होती जा रही है।
उसेंडी चले  ननकी की राह
वन मंत्री विक्रम उसेंडी राज्य के दूसरे ननकीराम कंवर हो गए हैं, जिनकी अपने ही महकमे में कोई सुनवाई नहीं हो रही है। पता चला है, वन मुख्यालय-अरण्य तो उन्हें एकदम भाव नहीं दे रहा। आईएफएस अफसर मोरगन को प्रशासन और एके द्विवेदी को वाइल्ड लाइफ से हटाने के लिए उसेंडी दसियों नोटशीट भेज चुके होंगे। पर अफसर उसे कूड़ेदान में डाल दे रहे हैं। उसेंडी की स्थिति मार्च के बाद ज्यादा खराब हुई है, जब अरण्य और मंत्रालय के नौकरशाहों के बीच के डोर मजबूत हुए। कमोवेश, ऐसी ही हालत गृह मंत्री ननकीराम कंवर की भी है। फर्क इतना ही है, ननकीराम फट पड़ते हैं और उसेंडी में उतना डेसिंग नहीं है। 
बैजेंद्र नया खेल
एन. बैजेंद्र कुमार सीएम के प्रींसिपल सिकरेट्री के साथ आवास पर्यावरण, जनसंपर्क और न्यू रायपुर तो देखहीरहे हैं इसके साथ, अपरोक्ष तौर पर आजकल एक नए रोल में भी हैं। किरदार है, राज्य के युवा आईएएसकोप्रशासन के गुर समझाने का। बैजेंद्र के सुझाव पर ही अब कलेक्टर बनने से पहले या एकाध जिला करचुकेअफसरों को राजधानी में पोस्ट किया जा रहा है। ताकि, वे सिस्टम को नजदीक से देखसकें.....उसकीपेचीदगियों से वाकिफ हो सकें......विधानसभा की अहमियत को जान सकें। अमित कटारियाबैजेंद्र के पहलेस्टूडेंट थे। आरडीए में सीईओ रहने के बाद वे अब रायगढ़ कलेक्टर हैं। इसके बाद एलेक्स पालमेनन, एसप्रकाश और हिमांशु गुप्ता को राजधानी बुलाया गया है। बैजेंद्र का मानना है, सिस्टम को समझ लेनेऔरराजधानी में तप जाने के बाद, आईएएस बढिय़ां ढंग से जिले में काम कर सकेंगे। ठीक है, बैजेंद्र सर।     
महापौर का मोह...
लगता है महापौर बनने के बाद भी किरण मयी नायक का कोर्ट का मोह नहीं छुट पाया है। हर बात पर कानून का दरवाजा खटखटाने को लेकर अब तो निगम के गलियारे से लेकर चौक चौराहों पर चुटकुले सुनाये जाने लगा है। बजबजाती नालियां हो  या भयंकर मच्छर चर्चा जब भी चलती है लोग कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने का सलाह ही नहीं देते बल्कि यह कहते भी नहीं चुकते कि एक नि मच्छरों के खिलाफ भी जनहित याचिका लग ही जायेगी।
अब सभापति के अविश्वास प्रस्ताव को कोर्ट द्वारा स्वीकृत नहीं करने पर लोग कहने लगे है कानून की ऐसी जानकारी का क्या फायदा ?
दयाल दास पर दया
वैसे तो प्रदेश भर में आरक्षण कटौति को लेकर सतनामी समाज नाराज है लेकिन सरकार के मंत्री दयाल दास बघेल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क तो इस बात से भी नहीं पड़ता कि उनकी कुछ नहीं चलती। सरकार का हिस्सा होने के बाद भी उन्हें खनिज माफियाओं की शिकायत इसलिए लिखित में करनी पड़ती है कि मुख्यमंत्री के पास खनिज विभाग है ।
सीधी कार्रवाई की बजाय शिकायत करने की वजह से विधानसभा में भी उनकी किरकिरी हुई लेकिन यहां भी कोई फर्क नहीं पड़ा। तभी तो कहा जाता है कि छत्तीसगढिय़ा सबले बढिय़ा । वैसे सबसे कम बजट भी दयाल दास बघेल को ही दिया गया है ।
अकेले पड़े अमितेष
शुक्ल खानदार के राजनैतिक उतराधिकारी और राजिम के विधायक अमितेष शुक्ल की दिक्कत यह है कि वे राजिम कुंभ के नाम पर हो रहे फर्जीवाड़े के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे हैं । सरकार की नीति के चलते यहां खुले आम शराब बिक रहे हैं और भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है। विधानसभा तक में अपनी आवाज उठा चुके अभितेष अब समझने लगे है कि कुंभ मामले में कांग्रेस से भी उनकी सहयोग क्यों नहीं मिल रहा है आखिर बिरजू की बांसूरी के सुर के कई कांग्रेसी कायल है ऐसे में उन्हें अकेले कुंभ समारोह के बहिष्कार का निर्णय लेना पड़ा।
महंत का खेल...
अपनी गुड़ाखू और गुरूमुख प्रेम की वजह से चर्चा में रहने वाले केन्द्रीय राज्य मंत्री चरणदास महंत इन दिनों हर हाल में खबरों में बने रहना चाहते हैं । तभी तो स्वयं को मुख्यमंत्री की दौड़ में बनाये रखने उन्होंने उम्र का सियासी दांव खेल दिया लेकिन दावं खेलते समाज वे भूल गए कि खूद भी 60 के करिब पहुंच चुके है । और कहीं उनका यह उम्र वाला बयान सढियाने की वजह न बन जाये

मोहन का स्टाईल...


चुनाव आते ही वैसे तो सभी नेताओं के कार्यो का लेखा जोखा चौक चौराहों पर चर्चा का विषय रहता है लेकिन लोक निर्माण मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की लीला ही निराली है । उनके स्टाईल का न केवल भाजपा बल्कि विपक्ष के कई नेता भी कायल है । और चुनाव आते ही बिरजू की बांसूरी के सुर और भी मधुर होने लगता है । तभी तो पिछले दिनों आर्शीवाद भवन में आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम में जब बृजमोहन अग्रवाल बगैर न्यौता के पहुंचे तो उनकी स्टाईल से समाज वाले गद्गद् हो गये । ये अलग बात है कि कुछ लोग यह कहते नहीं थक रहे हैं कि चुनाव आ गया है अब तो किसी को नहीं बुलाओं तब भी पहुंच जायेंगे । लोगों का क्या जितनी मुंह उतनी बात । अब मोहन का तो अपना स्टाईल है ।
अमर का डर...
लगता है प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल का ग्रह नक्षत्र ठीक नहीं चल रहा है तभी तो वे जब भी विदेश जाते हैं कोई न कोई बड़ा कांड हो जाता है और विधानसभा में जवाब देना मुश्किल हो जाता है ।
लगता है इस बार विधानसभा में नेत्र कांड की संभावित गुंज ने उन्हें भीतर तक हिला दिया है तभी तो वे बागबाहरा नेत्र कांड के दोषियों के खिलाफ आनन फानन में कार्रवाई कर दी जबकि अभी तक केन्द्रीय प्रयोगशाला से जांच रिपोर्ट नहीं आई है ।
पहले ही विभागीय अफसरों की करतूतों की वजह से अपनी किरकिरी करवा चुके अमर अग्रवाल के साथ दिक्कत यह है कि गर्भाशय कांड के खलनायक अभी भी मजे से प्रेक्टिस कर रहे है और लेन देन के खेल की वजह से ही उनके विभाग के घपलेबाजों के हौसले बुलंद है तो डर स्वाभाविक है ।
महुआ पर मेहरबानी...
महुआ मजूमदार इन दिनों प्रदेश भर में चर्चा का विषय है तो इसकी वजह उसकी कमजोर हिन्दी नहीं बल्कि सीएम हाऊस तक पहुंच है । तरह-तरह के इवेंट आर्गेनाइज करके सुर्खियों में रहने वाली शुभम शिक्षण संस्थान और उसकी कर्ताधर्ता महुआ मजुमदार के आगे अच्छे-अच्छे अफसर की बोलती बंद हो जाती है ।
यही वजह है कि यह महिला शराब बंदी आन्दोलन में भी प्रमुख किरदार निभाते दिखती है तो शराब परोसने वाली पार्टी के लिए भी इसे लाईसेंस मिल जाता है । कवर्धा में भी इसकी वजह से हंगामा मच चुका है ।
रमन का सच...
झालियायारी बलात्कार कांड में विपशी कांग्रेस के तेवर से भाजपा सकते में रही । इस घटना पर अजीत जोगी ने जिस अंदाज में मुख्यमंत्री रमन सिंह पर हमला किया उसका जवाब किसी के पास नहीं था । रामविचार नेताम जैसे दमदार मंत्री का भी गला भर आया लेकिन मुख्यमंत्री रमन सिंह राजनीति के मंजे खिलाड़ी की तरह अड़े रहे । विपक्ष ने जब मुख्यमंत्री के नहीं जाने पर सवाल उटाये तो डॉ. साहब ने कह दिया पीडि़त छात्राओं व उनके परिजनों से मिल चुका हूँ । अब मुख्यमंत्री ने कह दिया तो बात खतम । आखिर मुख्यमंत्री झूठ तो कहेंगे नहीं । दो माह बाद भी फास्ट ट्रेक अदालत में मामला नहीं गया है । सीएम साहब ने कह दिया कि फास्ट ट्रैक में सुनवाई होगी । अब विपक्ष तो कहेंगे ही लेकिन चुनावी साल में जिला बनाने का जश्र भी तो जरूरी है ।
धरम का अधर्म...
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सबसे चहेते माने जाने वाले विधानसभा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक इन दिनों परेशान है इसकी वजह विधानसभा सचिव देवेन्द्र वर्मा है । कहा जाता है कि देवेन्द्र के कारनामों के चलते कई अखबार वाले नाराज है यहां तक कि कांग्रेस ही नहीं सत्ता पंक्ष के कई विधायक व मंत्री भी इस मामले को लेकर शिकायत कर चूके है लेकिन कौशिक की दिक्कत यह है कि वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि देवेन्द्र वर्मा की ताकत के आगे वे बेबस है ऐसे में देवेन्द्र वर्मा का गुस्सा उन पर उतरने लगा है और चुनावी साल में यह गुस्सा कहीं भारी न पड़ जाये ।

अभिषेक की सक्रियता...


मुख्यमंत्री रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह ने भाजयुओं के तीन दिवसीय सम्मेलन में जिस तरह से तीनों दिन सक्रियता दिखाई उसके बाद तो उनके राजनीति की चर्चा शुरू हो जाना स्वाीााविक है । वैसे अभिषेक सिंह की सक्रियता तो राजनांदगांव में पहले से ही है और उनके द्वारा मोर्चा संभालने की भी चर्चा है लेकिन भाजयुओं के सम्मेलन में उनकी सक्रियता का अलग ही मतलब निकाला जा रहा है और कहा जा रहा है कि क्योंकि इस सम्मेलन के आखरी दिन मुख्यमंत्री का पूरा परिवार पत्नी वीणा सिंह, पुत्रवधु एश्वर्या सिंह, पुत्र अभिषेक सिंह भी मौजूद थे । आम तौर पर इतने बड़े राजनैतिक सम्मेलनों पर बहुत कम नेताओं के पूरा परिवार मौजूद होता है ।
बत्ती वाले लाल से पीले हो रहे ...
कहने को तो मुख्यमंत्री रमन सिंह के अपने विधानसभा क्षेत्र के बड़े नेताओं को खुश करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है यहां से लीलाराम भोजवानी, अशोक शर्मा और खूबचंद पारख को लालबत्ती दी है लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है असंतोष बढ़ता ही जा रहा है । कहा जाता है कि मुख्यमंत्री के द्वारा राजनांदगांव से ही चुनाव लडऩे की घोषणा का सबसे ज्यादा असर इन तीनों लालबत्ती धारियों पर हुआ है । लालबत्ती के सहारे विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे इन तीनों नेतओं की मौहें तन गई है भले ही पार्टी अनुशासन के चलते कोई कुछ बोल नहीं रहा है लेकिन कहा जा रहा है कि अपनी लालबत्ती के साथ वे दूसरी लालबत्ती को भी बुझाने की तैयारी में है ।
किरण की दिक्कत...
राजधानी के महापौर किरणमयी नायक की दिक्कतें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है । महापौर के साथ यह दिक्कत तो उनके जीत के साथ ही तब शुरू हो गई थी जब उन्होंने सभापति चुनाव में गैट छत्तीसगढिय़ा का नारा बुलंद करने वाली किरणमयी नायक के पद पाते ही बदले आप से कई छत्तीसगढिय़ा नाराज है और उनके द्वारा अपनी अनुपस्थिति में प्रभारी महापौर बनाने को लेकर भी छत्तीसगढिय़ों में आक्रोश है । जबकि गैर छत्तीसगढिय़ा नेता उन्हें फूंटी आंख नहीं भाते । और कांग्रेस के भीतर भी उनके खिलाफ आक्रोश भी जबरदस्त है । अभी वे सभापति के अविश्वास प्रस्ताव के मामले से उबर भी नहीं पाई है कि सरकारी बंगले में डेयरी संचालन का मामला सामने आ गया । कहा जाताह है कि इस बार गैर छत्तीसढिय़ों ने उन्हें घेरने पूरी तैयारी कर ली है और उन्हें बर्खास्त करने की मांग तक कर रहे हैं । ऐसे में उनकी स्थिति इधर कुआं उधर खाई की हो गई है कहा जाय तो गलत नहीं होगा ?

मूणत का प्रबंधन और गुस्सा ...
तीन दिवसीय भाजयुओं सम्मेलन के प्रबंधन में राजेश मूणत के कोई कमी नहीं की । लाखों रूपये खर्च कर तमाम तरह की सुविधाएं जुटाई गई और किसी चीज की कमी नहीं होने की गई । यहां तक कि कार्यकर्ताओं से उनका व्यवहार भी देखने लायक था लेकिन आदत से लाचार मूणत का सब्र आखरी दिन टूट गया और राजनाथ के स्वागत के लिए कार्यकर्ताओं में मची होड़ से वे अपनी जुबान पर काबू नहीं रख पाये । मंच से ही वे कार्यकर्ताओं को फटकार लगाने लगे । यानी अनुशासन वाली पार्टी में भी अनुशासन तार-तार होता है । तभी तो एक कार्यकर्ता को कहना पड़ा सुन लो भाई खर्चा तो इन्ही ने किया है ।

सुषमा की नसीहत ...
भाजयुओं के सम्मेलन में पहुंची लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भाजपाईयों को जमीन से जुड़कर काम करने की नसीहत दे डाली जबकि यहां के भाजपाई तो इस नसीहत पर पहले से ही चल रहे है । जमीन के कारोबार ही नहीं बल्कि सरकारी जमीन हड़पने का खेल भी खूब चल रहा है । ऐसे में सुषमा स्वराज की नसीहत को लेकर चर्चा यह है कि कहीं जमीन से जुडऩे वालें की वजह से पार्टी को शिकस्त न मिल जाए ।
बाम्बरा का खेल ...
अपनी चालबाज छवि के लिए चर्चित पुलिस अधिकारी जी एस बाम्बरा अपने रिटायर्टमेंट के बाद भी यदि विभाग की नौकरी पर बने हुए है तो यह उनकी अपनी योग्यता ही है । गोटीबाजी में माहिर बाम्बरा की चाल में उनके कट्टर विरोधी भी फंस जाते हैं तभी तो पिछले दिनों पत्रकारों की पिटाई के मामले में उन्होंने एक पुलिस अधिकारी को बदनाम करने से भी नहीं चूकें और जब देखा कि पुलिस अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ रहा है तो पत्रकारों को झूटी खबर देकर अपनी चालबाजी से बाज नहीं आये ।

सोनी की सीनाजोरी,,,


वैसे तो राविप्रा अध्यक्ष सुनील सोनी अपने को विवादों से दूर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तोल मोल के बोल की तर्ज पर राजनीति करने वाले सूनील सोनी के हर बोल के पीछे राजनीति छुपी होती है। श्यामाचरण शुक्ल पर हमला का मामला हो या रविभवन का मामला हो, कमल विहार से लेकर फ्ऱी होल्ड तक उनके एक एक शब्द के पीछे की राजनीति बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं।
इस बार फ्ऱी होल्ड के मामले में निगम की एनओसी को खारिज कर दिया गया कि टैक्स वसूली का काम निगम का है। कहा जाता है कि महापौर के पत्र को खारिज करने के पीछे किरण बिल्डिंग का मामला हो सकता है।

ननकी की नसीहत

अपनी बेबाक बयानी के लिए चर्चित प्रदेश के गृहमंत्री ननकी राम कंवर जब भी मुंह खोलते हैं विवादों में पड़ जाते हैं। ताजा मामला महिलाओं को उनकी नसीहत का है। ननकी राम कंवर अवैध शराब बिक्री से परेशान हैं और वे इसके खिलाफ़ अपनी पीड़ा विधानसभा में भी यह कहकर व्यक्त कर चुके हैं कि शराब ठेकेदारों के इशारे पर थाने चल रहे हैं।
वैसे पुलिस पर भरोसा नहीं होने की वजह से उन्हे अपना स्क्वाड तक बनाना पड़ा था और अब वे महिलाओं को अवैध शराब के खिलाफ़ न केवल कमर कसने की नसीहत दे रहे हैं बल्कि लाठी उठाने लिए तैयार रहने को कह रहे हैं। अब उनकी सलाह पर महिलाओं ने लाठी उठाई तो क्या होगा?
नादान नंदू
यह बात तो प्रदेश का अदना सा कांग्रेसी भी जानता है कि नंद कुमार पटेल कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जरुर बन गए हैं लेकिन उनसे ज्यादा जोगी, वोरा, महंत ही नहीं कई और नेताओं की दिल्ली में चलती है। तभी तो उनकी नाराजगी का कार्यकर्ताओं पर कोई असर नहीं दिखता उल्टे दिल्ली से आने वाले मंत्री उनके किए कराए पानी फ़ेर देते हैं। ऐसे में नंदकुमार पटेल को गुस्सा आना स्वाभाविक है। यही वजह है कि वे इस बार नए सिरे से अपने विरोधियों पर दबाव बनाने की नादानी कर रहे हैं।
शाबास पिल्ले
भाजपा शासन काल में अग्रवाल अफसर के घर छापा,मारना किसी अचरज से कम नहीं है। लेकिन 
88 बैच के साफ और सौम्य छबि के आईपीएस संजय पिल्ले को जब ईओडब्लू और एसीबी की कमान सौंपी गई थी, तो लोगों को लगा था अब छापे और ट्रेप में कमी आ जाएगी। मगर पिल्ले, तो पूर्ववर्ती ईओडब्लू चीफ दुर्गेश माधव अवस्थी से भी एक कदम आगे निकल गए। महीने भर के भीतर ही बड़ा निशाना बनाया। 10 करोड़ी अफसर को पकड़ा, डिप्टी कमिश्नर कामर्सियल टैक्स शंकरलाल अग्रवाल को। अब उनके निशाने पर कौन है यह चुनावी साल में वे भी इशारे पर काम करेगें ।
दिग्गज की नजर
वैसे तो कांग्रेस में दावेदारी नई बात नहीं है लेकिन जैजैपुर के विधायक महंत रामसुंदर दास की  सीट पर कांग्रेस के एक दिग्गज नेता की नजर गड़ गई है। नेताजी अपनी अद्र्धांगिनी को इस सीट से चुनाव लड़ाना चाहते हैं। जैजैपुर सामान्य सीट है और इस समय कांग्रेस के लिए सबसे मुफीद समझी जा रही है। सो, नेताजी को और क्या चाहिए। महंतजी को, उनके लोगों के जरिये समझाने की कोशिश की जा रही है कि जैजैपुर की जगह चांपा या सक्ती में से जहां चाहे, उन्हें टिकिट दिलवा दी जाएगी। पर, महंतजी इसके खतरे से अनभिज्ञ नहीं हैं। फिर, वे जैजैपुर से दूसरी बार विधायक हैं। और तीसरी बार में भी कोई दिक्कत नहीं है। खुदा-न-खास्ते कांग्रेस कहीं आ गई, तो महंतजी मंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे। ऐसे में मना करने के अलावा उनके पास चारा क्या था। मगर नेताजी के लोग कहां मानने वाले। महंतजी के कार्यकर्ताओं को तोडऩे का काम चालू हो गया है। अब देखना है, महंतजी झुकते हैं या नेताजी। 
बोरा की खुशी
गर्भवती महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री द्वारा महतारी एक्सप्रेस चलाने की योजना का ऐलान करने पर सयसे अधिक कोई खुश है, तो वे हैं आईएएस सोनमणि बोरा। यह कांसेप्ट मूलत: बोरा का था और इसके लिए उन्हें यूनिसेफ से जमकर सराहना मिली थी। 2010 में बोरा जब बिलासपुर के कलेक्टर थे, तब उन्होंने महतारी एक्सप्रेस चलाई थी। इसके लिए टोल फ्री नम्बर 102 रखा गया था। सरकारी वेबसाइट पर नजर डालें, तो इस योजना का सर्वाधिक लाभ दूरस्थ और आदिवासी इलाके की महिलाओं को मिला था। तब बिलासपुर का संस्थागत प्रसव 17 से बढ़कर 54 फीसदी पहुंच गया था। अब राज्य सरकार ने इसे एडाप्ट कर लिया है। जाहिर है, इससे बोरा का नम्बर बढ़ा है। बोरा अभी हाउसिंग बोर्ड के कमिश्नर के साथ ही डीपीआर हैं।
फेरबदल का चक्कर
एसपी की सर्जरी अभी और आगे टल सकती थी। मगर बालोद में सीएम के रोड शो में काला झंडा की वजह से एसपी के लिस्ट पर विचार शुरू हो गया है। और खबर, तो यहां तक है, 14-15 को आदेश निकल सकते हैं या फिर 20-21 को लगभग तय मानिये। सिर्फ सीएम की अति व्यस्तता की वजह से इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो पा रहा है। जाहिर है, सूची में बालोद एसपी डीएल मनहर का नाम, एक नम्बर पर रहेगा। उसके बाद, रायपुर, रायगढ़, जांजगीर जैसे दर्जन भर से अधिक जिले होंगे। दावा ऐसा भी है कि रमन सरकार के नौ साल में एसपी लेवल पर यह सबसे बड़ा फेरबदल होगा। 27 में से आधे से अधिक जिले के एसपी बदल जाएंगे। इसकी वजह यह है कि मुख्यमंत्री एसपी के पारफारमेंस से खुश नहीं हैं। दूसरा, इस साल चुनाव भी है। रही राजधानी रायपुर की बात, तो किसी मैच्योर परसन को यहां की कमान सौंपी जाएगी। या तो रायगढ़ के एसपी आनंद छाबड़ा प्रोन्नत होकर एसएसपी बनेंगे या फिर बिलासपुर के रतनलाल डांगी को मौका दिया जाएगा। एसपी के रूप में डांगी का बिलासपुर चैथा जिला है। इसके अलावा रायपुर के लायक कोई आईपीएस सरकार को नहीं दिख रहा। तमिलनाडू कैडर से डेपुटेशन पर आई सोनल मिश्रा का नाम जरूर उछला था, मगर सरकार को नया चेहरा हजम नहीं हो रहा है। 

डॉ बांठिया के सरेण्डर का राज...



स्मार्ट कार्ड घोटाले में बुरी तरह फ़ंसे डॉ राजेन्द्र बांठिया को अंतत: पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पाई और डॉक्टर साहब ने आत्म समर्पण कर दिया। जेल में डॉक्टर साहब का क्या होगा वह तो बाद में पता चलेगा लेकिन जब सब कुछ सेट था तब उन्होने सरेण्डर क्यों किया इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। कहा जा रहा है कि उनकी गिरफ़्तारी को लेकर मीडिया का दबाव बढ़ता ही जा रहा था और पुलिस को डॉक्टर साहब की सम्पत्ति कुर्की करने का फऱमान जारी करना पड़ा। संपत्ति कुर्की के फऱमान का असर भी हुआ और कहा जाता है कि डॉक्टर साहब जिस आका के  दम पर फऱारी काट रहे थे उन्होने भी हाथ खड़े कर दिए।
भोंदू का जेल में भी जलवा
शहर की सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद के मुतवल्ली अब्दुल अजीम भोंदू को पुलिस ने गिरफ़्तार करके उसकी राजनीति का जुलूस जरुर निकाल दिया है लेकिन इस भाजपा नेता का प्रभाव कम नहीं हुआ है। तभी तो जेल से लेकर अस्पताल तक उसकी दबंगई के किस्से चौक चौराहों पर सुने जा सकते हैं। कहा जाता है कि जेल में भाजपाई होने का फ़ायदा तो मिल ही रहा है उसकी बात भी सबसे आसानी से हो जाती है। वैसे भी मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के खास बन चुके भोंदू की गिरफ़्तारी के पीछे कुछ न कुछ खेल है और इसका परिणाम आगे देखने को मिलेगा।
रमन का फ़्लाप शो...
अपनी साफ़ छवि के दम पर दूसरी पारी खेल रहे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का ब्रह्मास्त्र क्या है यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इन दिनों ने बने नौ जिलों में उनका रोड़ शो फ़्लाप साबित हो रहा है। कांग्रेस के विरोध के चलते प्रशासन की हालत खराब हो गई है और बढ़ती सुरक्षा के चलते आम आदमी की परेशानी भी कम नहीं है इसलिए रोड शो में सरकारी अमले और भाजपाई ही शामिल हो रहे है फिऱ बगैर सुविधाओं के जिलों से लोगों में नाराजगी भी कम नहीं है। अब तो भाजपाई भी कहने लगे हैं कि इस फ़्लाप शो का ईलाज कौन सा ब्रह्मास्त्र है।
मूणत की चुप्पी...
अपनी बदजुबानी के लिए विख्यात प्रदेश के उद्योग मंत्री राजेश मूणत को गुस्सा जल्दी आ जाता है और गुस्सा आता है तो वे उसे रोक भी नहीं पाते, ऐसे में जुबान से गालियां निकलना स्वाभाविक है। पिछले दिनों समता गृह निर्माण मंडल के कार्यक्रम में भी यही हुआ। लेकिन उन्होने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी इस गाली का असर इस तरह होगा कि उन्हे इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। कहा जा रहा है कि समता वाली घटना के दौरान बैस परिवार के एक सदस्य भी मौजूद थे और उन्होने मूणत के इस रवैये पर ऐसी बात कही कि मूणत को खामोशी ओढऩी पड़ी। आखिर इस साल के अंत में विधानसभा का चुनाव जो है।
मधुसूदन की मुस्कान ...
राजनांदगांव के सांसद मधुसूदन यादव इन दिनों मुस्कुराते नहीं थकते तो इसकी वजह मुख्यमंत्री रमन सिंह से सीधी पैठ को बताया जा रहा है। कहा जाता है कि मधुसूदन की इस मुस्कान ने अच्छे अच्छों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर अपने को बड़ा नेता मानने वालों की नींद ही गायब हो गई है। शिक्षा कर्मियों के मामले में मधुसूदन को हीरो बनाकर मुख्यमंत्री ने अपने विरोधियों को यह जता दिया है कि वे किसी को भी हीरो बना सकते हैं और यही वजह है कि मधुसूदन यादव की मुस्कान से कई नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है। कहा जाता है कि रमेश बैस, सरोज पांडे, नंदकुमार साय जैसे सांसदों पर अप्रत्यक्ष हमला कर मुख्यमंत्री ने अपना उद्देश्य भी बता दिया है।
राम निवास की दिक्कत...
यह तो सिर मुडाते ही ओले पडऩे वाली कहावत को चरितार्थ करता है वरना यादवी ब्रिगेड के हीरो रामनिवास को डी जी बनने के बाद हाईकोर्ट से यह सब सुनने नहीं मिलता। कोर्ट में  पहुंच कर व्यवस्था सुधारने का वादा कर चुके डी जी के सामने सबसे बड़ी दिक्कत तो पी एच क्यू में व्याप्त गुटबाजी है। इसके अलावा राजनैतिक दबाव से थाने में जमे थानेदारों की करतूत भी कम नहीं है। राजधानी में चार साल से जमे पुलिस कप्तान सहित कई अधिकारियों के कारनामों पर भी वे खुश नहीं हैं। ऐसे में उनकी कितनी चलती है यह सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुनील कुमार की पीड़ा...
अपनी ईमानदार छवि को लेकर मुख्य सचिव के पद तक सफऱ करने वाले सुनील कुमार इन दिनों अखबारों से भी दुखी हैं और उनकी पीड़ा गांधी जी की पूण्य तिथि के दिन होठों से निकल ही गई। मंत्रालय के निरीक्षण करते मुख्य सचिव महोदय छज्जा गिरने वाले लेखा शाखा में पहुंचे और अधिकारियों ने जब खास नुकसान नहीं होने की जानकारी दी तो वे बोल पड़े, नुकसान से ज्यादा अखबारों में प्रकाशित हो गया। अब मुख्य सचिव महोदय को कौन समझाए कि छज्जा गिरना भी बड़ी खबर है वह भी तब जब मंत्रायल को बने ज्यादा दिन नहीं हुए हैं।

प्रतिज्ञा में फ़ंसे ठाकुर


महाभारत में बार-बार चेताया गया है कि बिना सोचे समझे प्रतिज्ञा या संकल्प मत करो। इसी प्रतिज्ञा के चलते भीष्म पितामह न केवल कुंवारे रह गए बल्कि जिन्दगी भर रोते रहे और दूर्योधन जैसे दुष्ट का साथ देना पड़ा। ऐसी जिद वाली प्रतिज्ञा के चलते अर्जुन की आग में जलकर प्राण त्यागने की नौबत आ गई थी वह कृष्ण की चतुराई से जयद्रथ दिन ढलने से पहले मारा गया। ये बात हिन्दुत्व की दुहाई देने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह को समझ नहीं आई या वे महाभारत नहीं पढ पाए, ये तो वही जाने। लेकिन ऐसी ही प्रतिज्ञा याने संकल्प के चलते शिक्षाकर्मी और 270 रुपए बोनस नहीं पाने वाले किसान नाराज हो गए हैं। तो अब ठाकुर की ठकुराई का क्या होगा? भाजपा की चिंता स्वाभाविक है।
पटेल की परेशानी
जब से अजीत जोगी गुट को छोड़कर प्रदेश कांग्रेस का ताज अपने सिर लिया है नंदकुमार पटेल की मुसिबत थमने का नाम ही नहीं ले रही है। एक तरफ़ भाजपा से कांग्रेसियों की सेटिंग की खबर से हैरान है तो दूसरी तरफ़ नेता प्रतिपक्ष से पटरी बिठाने की जिम्मेदारी बढने लगी है। कहा जाता है कि अजीत जोगी, मोतीलाल वोरा और विद्याचरण शुक्ल को खुश रखने के की कवायद में कई बार वे दुखी हो जाते हैं। जबकि भाजपा के खिलाफ़ दमदार प्रदर्शन के बाद भी उन्हे महंत के सामने कमजोर समझा जाता है।
ऐसे में प्रदेशाध्यक्ष द्वारा चुनाव नहीं लडऩे के फऱमान ने उनकी चिंता बढा दी है। ऐसे में सीएम का सपना कहां जाएगा यह कम चिंतनीय नहीं है।
सिघानिया की चालाकी
रायपुर शहर से विधानसभा चुनाव हारने के बाद कसडोल के विधायक राजकमल सिंघानिया को यह बात समझ में आ गई थी कि चाहे जितना भी पैसा खर्च कर लो शहर में उनकी अपनी छवि के चलते जीत नहीं हो सकती। तभी तो चालाकी से न केवल कसडोल से टिकिट हासिल कर ली बल्कि दो बार विधायक भी बन गए। कहते हैं की दूध का जला छाछ को फ़ूंक-फ़ूंक कर पीता है। तभी तो वे कांग्रेस के कलेक्टर घेराव प्रदर्शन से दूर तब तक रहे जब तक किसान मोर्चा का प्रदर्शन खत्म नहीं हो गया। वे जानते थे कि किसान मोर्चा में प्रदर्शन करने वाले राजकमल सिंघानिया की छवि अच्छे से बनाएगें और रामगुलाम ठाकुर ने किया भी वही। बाद में दशरथ वर्मा के घर में बैठकर अपनी उपस्थिति की चालाकी कर गए।
सीएस की स्वीकारोक्ति
अपनी साफ़ सुथरी और ईमानदार छवि के लिए विख्यात प्रदेश के सीएस यानी मुख्य सचिव सुनील कुमार को आखिर हाईकोर्ट जाना ही पड़ गया। राज्य में रमन सरकार की करतूतों की वजह से अफ़सरशाही हावी है। भ्रष्टाचार में गले तक डुबे अफ़सरों को सरकार का सीधा सरंक्षण है, यही वजह है कि आम आदमी अफ़सरशाही से त्रस्त है ही न्यायालय भि अफ़सरों के रवैये से हैरान है। तभी तो न्यायालय को मुख्य सचिव को तलब करना पड़ा। पदोन्नति से लेकर तबादलों में मनमानी चरम पर है और सरकार के मंत्री इस पर ध्यान नही दे रहे हैं। इसलिए लोग न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर हैं। अब न्यायालय ने जब इसे संज्ञान में लिया तो मुख्य सचिव ने न केवल गलती स्वीकारी बल्कि दोबारा शिकायत का मौका नहीं देने का वादा भी किया है। देखना है आगे क्या होता है।
कंवर का कहर...
अपने बेबाक बोलों से से हमेशा ही सुर्खियों में बने रहने वाले प्रदेश के गृहमंत्री ननकी राम कंवर के कहर से न मुख्यमंत्री बच पाए हैं और नही पुलिस निदेशक बचे हैं। इस बार उनके निशाने पर अधिकारी रहे। बैंक शाखा में कोर बैंकिंग की शुरुवात करने पंडरिया पहुंचे कंवर ने बैंकों के द्वारा गैर किसानों को लोन देने के मामले में कहा कि किसान बेईमान नहीं होता और न ही जनता बेईमान होती है। बेईमान तो अधिकारी होता है।
कंवर साहब नेताओं की बेईमानी का क्या होगा ? आखिर राजकुमार नायड़ू जैसे आरोपी अफ़सर को संरक्षण किसने दिया था ?
मोहिले भी भयभीत
लोकसभा छोड़ विधानसभा में जीत हासिल करने के वाले सतनामी समाज के नेता और प्रदेश के खाद्य मंत्री पुन्नुलाल मोहिले पिछली बार जितने निश्चिंत थे वैसे बेफ्ऱिकी अब नहीं दिखाई पड़ रही है। सतनामी समाज आरक्षण से कटौती के चलते भाजपा सरकार से नाराज है और जिस तरह से उन्हे समाज के लोगों से सुनना पड़ रहा है उससे वे बेहद परेशान बताए जा रहे हैं। भले ही रमन सरकार चुनावी बजट में सतनामी समाज को खुश कर दे, लेकिन फि़लहाल तो चिंता की रेखाएं पुन्नुलाल मोहिले के चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
रामविचार का दुर्भाग्य
प्रदेश सरकार के जलसंसाधन मंत्री रामविचार नेताम जब भी अपनी ताकत बढाने की सोचते हैं तब कुछ न कुछ गडग़ड़ हो जाती है। मुख्यमंत्री बनने की कोशिश पहले ही पकड़ ली गई तो पत्नी के जिला पंचायत में विवाद से उनकी छवि पर असर पड़ा। पंचायत विभाग छोड़ कर जलसंसाधन विभाग पहुंचे तो घपलेबाजी ने उनकी मिट्टी पलीद करना शुरु कर दिया। बेचारे नेताम जी नमाज माफ़ कराने गए तो रोजे गले पड़ गए की तर्ज पर मैनपाट कार्निवल के अश्लील नाच में फ़ंस गए। मैनपाट कार्निवल में विदेशी पर्यटकों को लुभाने की कोशिश इतनी भारी पड़ी कि अब वे सफ़ाई देते घुम रहे हैं कि यह उनका कार्यक्रम नहीं बल्कि बृजमोहन अग्रवाल के विभाग का कार्यक्रम था। अब अश्लील डांस तो हुआ है और तालियाँ भी बजाई गई है तो इस मजे की सजा भी जरुरी है।